फैली बागीचों से क्षितिज तक
मख़मल सी कोमल हरियाली।
लिपट रही जिससे रवि -किरणें
वो झिलमिल झिलमिल
चाँदी की सी उजली जाली !
हरित रुधिर पौधों का रहा छलक
लहरा रहा है, पथ के ऊपर
नभ का चीर, निर्मल फलक।
रंग रंगीले फूलों से हिल-मिल,
इठला रही तितली रानी ।
शीतल हिम-पवन की आली,
वो मद्धम मद्धम लहराती
सौने की सी गेहूं की बाली !
लद गईं आम्र तरु की डाली,
पीले, मीठे अमरूदों की,
उड़ती भीनी-भीनी खुशबु से,
हो उठी कोकिला मतवाली!
This poem is dedicated to the holy nature...