Friday, April 15, 2011

हरियाली


फैली बागीचों से क्षितिज तक

मख़मल सी कोमल हरियाली।

लिपट रही जिससे रवि -किरणें

वो झिलमिल झिलमिल

चाँदी की सी उजली जाली !


 हरित रुधिर पौधों का रहा छलक

लहरा रहा है, पथ के ऊपर

नभ का चीर, निर्मल फलक।



 रंग रंगीले फूलों से हिल-मिल,

इठला रही तितली रानी ।

शीतल हिम-पवन  की आली,

वो मद्धम मद्धम लहराती

सौने की सी गेहूं की बाली !


लद गईं आम्र तरु की डाली,

पीले, मीठे अमरूदों  की,

उड़ती भीनी-भीनी खुशबु से,

हो उठी कोकिला मतवाली!


This poem is dedicated to the holy nature...