Friday, April 15, 2011

हरियाली


फैली बागीचों से क्षितिज तक

मख़मल सी कोमल हरियाली।

लिपट रही जिससे रवि -किरणें

वो झिलमिल झिलमिल

चाँदी की सी उजली जाली !


 हरित रुधिर पौधों का रहा छलक

लहरा रहा है, पथ के ऊपर

नभ का चीर, निर्मल फलक।



 रंग रंगीले फूलों से हिल-मिल,

इठला रही तितली रानी ।

शीतल हिम-पवन  की आली,

वो मद्धम मद्धम लहराती

सौने की सी गेहूं की बाली !


लद गईं आम्र तरु की डाली,

पीले, मीठे अमरूदों  की,

उड़ती भीनी-भीनी खुशबु से,

हो उठी कोकिला मतवाली!


This poem is dedicated to the holy nature...

4 comments:

  1. i think this is dedicated to ur mother...........
    or kya hindi h yr.......

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  2. tune banayi ya copy paste ki???
    lag nahi raha tune banayi

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  3. le ek choti si poem tere upar,on the spot ...tu bhi kya yaad rakhega.. :D


    एक विचित्र ब्राह्मिन चित्रकार,

    किंचित चिंतित सा

    शून्य में विचार-मग्न,

    मन में मेनका का प्रकार !



    वो स्वप्न परी की अभिलाषा

    अंकित,उदधृत करते हुए

    परेशान प्रतीत सा,

    मृग-मरिचिका में पूर्ण लाचार!

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  4. maaf kar de yaar tu to faltu m bura man jata h....
    mene to bs mzk kiya tha!!!
    wese ye wala v bht acha h!!!

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