फैली बागीचों से क्षितिज तक
मख़मल सी कोमल हरियाली।
लिपट रही जिससे रवि -किरणें
वो झिलमिल झिलमिल
चाँदी की सी उजली जाली !
हरित रुधिर पौधों का रहा छलक
लहरा रहा है, पथ के ऊपर
नभ का चीर, निर्मल फलक।
रंग रंगीले फूलों से हिल-मिल,
इठला रही तितली रानी ।
शीतल हिम-पवन की आली,
वो मद्धम मद्धम लहराती
सौने की सी गेहूं की बाली !
लद गईं आम्र तरु की डाली,
पीले, मीठे अमरूदों की,
उड़ती भीनी-भीनी खुशबु से,
हो उठी कोकिला मतवाली!
This poem is dedicated to the holy nature...
i think this is dedicated to ur mother...........
ReplyDeleteor kya hindi h yr.......
tune banayi ya copy paste ki???
ReplyDeletelag nahi raha tune banayi
le ek choti si poem tere upar,on the spot ...tu bhi kya yaad rakhega.. :D
ReplyDeleteएक विचित्र ब्राह्मिन चित्रकार,
किंचित चिंतित सा
शून्य में विचार-मग्न,
मन में मेनका का प्रकार !
वो स्वप्न परी की अभिलाषा
अंकित,उदधृत करते हुए
परेशान प्रतीत सा,
मृग-मरिचिका में पूर्ण लाचार!
maaf kar de yaar tu to faltu m bura man jata h....
ReplyDeletemene to bs mzk kiya tha!!!
wese ye wala v bht acha h!!!